देह का अंत

इस जीवन के पथ पर देह का निश्चित अंत हैं ना कर कोई अभिलाषा फैला परोपकार की परिभाषा वह जानता हैं उपत्ति तेरी वह पहचानता अस्तित्व तेरा जब जीवन का अंत आता निष्प्राण देह पर लगे फूलों के ढ़ेर सुगंधित नहीं होता देह श्रृंगारों से प्रेम के निश्छल आँसुओं से देह के संग किया अग्नि ने पंचत्व श्रृंगार एक दिन होना था आत्म का परमात्मा में मिलन @laxmikantvj http://@swaranjaali

कवि परिचय

मैं कवि नहीं, मैं शायर नहीं।मनमौजी मन चन्चल हुँ।अपने मन चिन्तन को कागज..के पटल पर रखता हुँ।गलती हौती रहती है।कौशिश करता रहता हुँ।एक दिन मेरी कलम खिलेगी..दुनिया के पन्नो पर।यही विश्वास लेकर मे लिखता हुँ।

#लक्ष्मीकांत_विजय ✍

वह दौर कहाँ अब

...🌟🌟स्वरांजली 🌟🌟...

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🌟स्वरांजली🌟 शब्दों की गूँज🌟


वो दौर कहां जिसमें
इंसान की खुशबू हो..!

इंसान की आँखो में
ईमान की खुशबू हो..!

पाकीजा अजाओ में मीरा
के भजन की खुशबू हो

नो दिन के उपवास में
रमजान की खुशबू हो..!

मस्जिद के फिजाओं
में चंदन की खुशबू हो..!

मंदिर की फिजाओं में
लोबान की खुशबू हो..!

मुझे भी तेरी पहचान की खुशबू हो..!

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रचनाकार [{ कवयित्री/कवि }] :- लक्ष्मीकांत विजय✍


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अहम् निरन्तर देता भय

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अहम् निरन्तर देता भय
वाकिफ़ कहाँ जमाना हैं।
हार रहा इंसान इससे
यह बुनियादें खोद रहा हैं।

दर्द वेदना के तानों में
मानव विपत्ति से घिर गया।
निरन्तर बढ़ता अहम्
जन – जन पर भारी पड़ रहा हैं।

लघु वार्ता विस्तृत हो रही
घट रहा सम्मान यहाँ।
रंग जीवन का उड़ रहा
आँखों से बह रहा पानी।

दिन का उजाला हुआ
पल भर में हो रही साँझ।
मन मेरा भर रहा
इस जीवन के अंधड़ में।

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रचनाकार [{ कवयित्री/कवि }] :- लक्ष्मीकांत विजय✍


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आकांक्षाओं की एक दौड़ लगी

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क्षणिक खुशियां पाने की होड़ लगी।

आकांक्षाओं की एक दौड़ लगी।।

विश्वास के रिश्तों में होड़ लगी।
झूठे जज्बातों की दौड़ लगी।।

सुख-सुविधाओं की चाह में होड़ लगी।।
किसी भीड़ की लंबी कतार में दौड़ लगी।।
पुरानी अभिलाषा पाने में होड़ लगी। नारी चेष्टा की ये दौड़ लगी।।

निराशा में आशा पाने की होड़ लगी।
दो दिलों के धड़कनों की दौड़ लगी।।

लालच और लोभ में होड़ लगी।
जिंदगी की राह में दौड़ लगी।।

लोगों में इज्जत पाने की होड़ लगी।
भीड़ में पैसा कमाने की दौड़ लगी।।

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रचनाकार [{ कवयित्री/कवि }] :- लक्ष्मीकांत विजय✍


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तुलसी का पौधा

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इसकी यह मनमोहक छवि
आंगन में तुलसी का पौधा

यह सब के मन को लुभाता हैं
प्रेम इसका अजय हमसे यह कैसा नाता हैं

धर्म निष्ठा का यह पौधा, जीवन सुलभ बनाता
सब रोगो के ऊपर, शरीर की रक्षा करता

यह जग का सुख दाता, वर दाता
यह पैतृक तुलसी का पौधा..

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रचनाकार [{ कवयित्री/कवि }] :- लक्ष्मीकांत विजय✍


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नाजुक सी निगाहें

आंखों में अश्क़ हैं..

ग़मगीन होकर बैठे हो..

नाजुक सी निगाहों में..

नाजुक सा फ़साना हैं..

इश्क़ हम आज भी..

तुझे बेपनाह करते हैं..

मगर तेरा इंतजार नहीं करते..

दस्तक देते हाथ थके

किसे अच्छी लगती है बेहूदगी की दस्तक

अब बेनकाब कर दो हेवानियत के चेहरे

रह जाए अनसुनी सी तन्गदिली की दस्तक

कह दो ये वहशतों से की सही न जाएगी

अब इस गुलिस्ताँ में हमसे विरानगी की दस्तक।

गुमनाम तलाश

तलाश जिसकी मैंने की वह किताबों में धस गई एक बार नहीं मैंने उसे सौ बार निकाला पर वो टस से मस ना हुई गुल को महक-हवाओं ने कहा कि गुलशन ए उल्फत बिखर के टूट गए जब सूरत ए तलाश निकल के बाहर आई।

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